urjadhani express

samasya nahi samadhan bane.

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pramod chaubey


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जय हो राष्ट्रीय शर्म की

Posted On: 15 Jan, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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भ्रष्टाचार की करें तेरही…

Posted On: 23 Dec, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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वेट करें सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का….

Posted On: 19 Dec, 2011  
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बहन भाई की करे सेवा या पत्नी दे पति का साथ…..

Posted On: 15 Dec, 2011  
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निन्दक नियरे राखिये…..

Posted On: 14 Dec, 2011  
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हमने भगवान देखा…

Posted On: 8 Dec, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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मेरी शादी गरीब लड़के से करना….

Posted On: 23 Nov, 2011  
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मेरी शादी गरीब लड़के से करना….

Posted On: 23 Nov, 2011  
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आजादी के मायने मनमानी नहीं

Posted On: 24 Oct, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

प्रमोद जी सादर नमस्कार, समस्या जटिल जरुर है किसी को भी छोड़ा नहीं जा सकता.किन्तु एक बात जो बहुत मायने रखती है कि दहेज़ किससे माँगा जा रहा है.उस भाई से जो पलंग से उठ भी नहीं सकता? या उन भाइयों से जो उसे बेसहारा छोड़कर अलग हो गए? मेरा भाई के पक्ष में इच्छा म्रत्यु का समर्थन है.कारण सीधा है कि अब वह उठ नहीं सकेगा, जब तक जियेगा किसी पर बोझ ही रहेगा फिर जब सेवा का आधार ही नाजुक हो तो वह किस से अपेक्षा करेगा. बहन के लिए पति और भाई दोनों अनमोल हैं. उसे या तो अन्य भाइयों को मनाना होगा या तो अपने ससुराल वालों को मनाना होगा जिससे कि भाई कि देखभाल भी हो सके जब तक उसका जीवन है. अंत में मै यही कहना चाहूँगा कि मानवता जहां है वहीँ जीवन है.

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प्रमोद जी सादर नमस्कार, सार्थक आलेख से आपने विदेशी निवेश पर जाग्रति की अपेक्षा की है वैसे भी अब सरकार स्वयं ही जाग गयी है या तो कुर्सी खिसकती देख नींद स्वयं ही भाग गयी है. जनता का तो ऐसा ही है की जब कोई वस्तु जहां सस्ती मिलती है वहीँ से लेती है और मै तो यही कहता हूँ की लेना भी चाहिए इसमें कोई बुराई नहीं है. समझना तो उस सरकार को चाहिए की इसके दूरगामी नतीजे क्या परिणाम देंगे. आज सीना ठोक कर खुदरा में विदेशी निवेश की वकालत करने वाले अपने आदर्श महात्मा गाँधी के सपनो की बलि चढाने को क्यों उतावले हैं जबकि स्वयं गांधी जी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर स्वदेशी की वकालत की थी.जरूर ही कोई राज है. और रही इनकी नेत्री की बात तो सब जानते हैं की उनके विदेशी प्रवास का क्या कारण था.आज तक कालाधन वालों के नाम सार्वजनिक नहीं करने वालों से बहुत उम्मीदे करना खुद से ही बेईमानी करना है.धन्यवाद.

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प्रमोद जी सादर नमस्कार और बहुत अंतराल के बाद लिखने पर आपका स्वागत, आपने बहुत ही ठीक बात कही कि पैसा देखकर शादी करना अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है.मेरा मत सिर्फ बराबरी ही नहीं बल्कि उस परिवार के आदर्श और सिद्धांतो को देखना भी काफी महत्वपूर्ण है.हम रिश्ते कि बातें करने जाते हैं तो पीढ़ियों कि जानकारी सिर्फ इसीलिए लेते हैं ताकि उस परिवार के पिछले कर्मो का पता लग सके. पिता सोचता तो यही है कि मेरी पुत्री को ससुराल में भी वाही सुख मिले जो हमने उसको दिए हैं, मगर शायद ही ऐसा हो पाता है.फिरभी ससुराल से मुस्कुराती लौटती बेटी को देखकर ही माता पिता असीम सुख कि अनुभूति करते हैं.धन्यवाद.

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आदरणीय प्रमोद जी नमस्कार, अभिव्यक्ति की आजादी होना है चाहिए.सही कहा आपने हमें बंटने में ज्यादा ख़ुशी होती है.यही कारण है की हम ने अपने आप को जाति-धर्म,आरक्षण-अनारक्षण,आमिर-गरीब और गरीब से भी गरीब जैसे कई तरह से बाँट रखा है नए नए प्रान्त बनते जा रहे हैं. खैर, बात अभिव्यक्ति की आजादी की है.हमें अभिव्यक्ति की आजादी है तो हम उसका दुरुपयोग करें ये तो कदापि ठीक नहीं है यदि हमार पास मोटर कार का लाइसेंस है तो हम उसे निर्धारित नियमों के अनुसार ही चलाएंगे ना की मनमाने तरीके से या फिर कुछ बातें हम चार दोस्त इकठ्ठा हो कर करते हैं शायद हम अन्य किसी के सामने बोल भी ना पायें.दरअसल हर बात बोलने का एक मंच होता है. आपको वहीं पर अपनी बात कहनी होगी. अन्यथा तो हम देख ही रहे हैं कैसी दुश्वारियां आगई हैं. दूसरा यह भी की हमें बोलने की रोक नहीं है तो हम कुछ भी अनर्गल प्रलाप ही करने लगें. कुछ समस्याएं ऐसी भी देखि जा रही है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधा अर्थ यह है की आपनी बात पूर्ण संयम से सही जगह रखी जाए और पूर्ण निष्पक्ष रूप से रखी जाए ताकि किसी भी समस्या का सटीक हल निकलने में मदत मिलें. धन्यवाद..

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"किसी का दोष नहीं ये कुसूर मेरा है बुझा है मेरे ही हांथों चिराग साहिल का" नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आजादी के बाद देश में लोकतंत्र के बजाय सैनिक शासन के हिमायती थे ;इसके पीछे उनका ये तर्क था कि लोकतंत्र एक बडी जिम्मेदारी है जिसे निभाने के लिए जनता में उचित शिक्षा; देश ,समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का सही प्रकार से जानना आवश्यक है l उनका मानना था कि " आज की तारीख में जनता की मानसिकता एक कैदी की तरह है जो कि कैद से छूटते ही अपनी सभी इच्छाएं जायज या नाजायज तरीकों से जल्द से जल्द पूरी कर लेना चाहता है ,इसीलिए इन्हें५० सालों तक सैनिक शासन में रखकर उचित शिक्षा के द्वारा अपने कर्तव्यों का बोध एवं उसका पालन करने का संस्कार तब तक दिया जाय जब तक कि ये संस्कार अगली पीढ़ी में आदत न बन जाये ,और केवल उसके बाद ही देश में लोक तंत्र लागू किया जाये" लेकिन ये इस देश कि जनता और देश का दुर्भाग्य कि किसी को उस वक्त उनकी बात समझ में नही आई l और आज जब कि लोकतंत्र असफलता के कगार पर है तो हम एक दूसरे कि ओर उँगलियाँ उठाते हैं लेकिन ये भूल जाते हैं कि दूसरों कि ओर एक ऊँगली उठाते ही अपने ही हाथ की बाकी उँगलियाँ हमारी ओर इंगित करती हैं l देश का चरित्र संसाधनों से नहीं देशवासियों के चरित्र से बनता है ,आजादी के वक्त देश के नेतृत्व ने नेताजी की बात न मानकर कुंठाओं,लिप्साओं को फलने-फूलने का स्वर्णिम अवसर प्रदान किया जिसका परिणाम आज देश की वर्तमान परिस्थिति है l संसाधन उस आटे कि तरह है जिससे रोटी या पूरी बनाई जा सकती है लेकिन अगर वो ही आटा कुत्ते को देदिया जाय तो ? इसलिए मेरा ये मानना है कि आजादी के बाद लोकतंत्र हमारे लिए बन्दर के हाथों में उस्तरे कि तरह बन गया जिससे हमने केवल अपने देश,समाज को लहूलुहान ही किया है l

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आदरणीय प्रमोद जी नमस्कार, राजनेता जो आज शासन कर रहे हैं या शासन करने के लिए लालायीत है सब यह मान कर चल रहे हैं की राजनीति हमारी ही बपौती है, दरअसल पिछले कुछ वर्षों में दिग्गी जैसे कई नेताओं ने राजनीति को इतना बड़ा कीचड़ का तालाब बना दिया है और उसमे मजे से बैठे हैं कोई बाहर से कुछ कहता है तो कहते हैं आप भी आ जाओ देखते हैं की कैसे साफ़ बाहर निकल पाओगे. अब यदि अन्ना टीम की जांच हो भी रही हैं तो कोई बात नहीं सच्चाई सबके सामने आना ही चाहिए.किन्तु कंप्यूटर लोन का बकाया है जैसी सच्चाई राजनेताओं के चरित्र को उजागर करती है. अन्ना ही क्या जो भी लड़ाई के मैदान में कूदेगा उसको सर पर कफ़न बांधकर ही आना होगा. आपका लेखन आपके मनोभाव को बखूबी प्रदर्शित करता है.थोडा मन पर काबू कर के लिखा होता तो अवश्य ही आदरणीय राजकमल जी को शिकायत ना होती. धन्यवाद.

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प्रमोद जी सादर नमस्कार, जन लोकपाल सिर्फ कांग्रेस ही नहीं सभी राजनितिक दलों के गले की हड्डी है.जिनको रोज मीठा खाने की आदात पड़ जाए उनके लिए उस मीठे को छोड़ना मुश्किल हो जाता है.अब सारे राजनितिक ही मीठे के आदि हो चुके हैं. मेडिकल सर्वे की रिपोर्ट बताती है की हिन्दुस्तान में शुगर के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं. इन सारे राजनेताओं को शुगर हो गयी है अब डॉ. इन्हें करेले का जूस पीने के लिए कह रहा है तो क्या इनके गले उतरेगा. आसान नहीं है.जनता का जो समूह सारे राजनेताओं ने देखा जो कभी इन्होने किसीभी राजनितिक दल के पीछे नहीं देखा उसको देखकर सब चौंक गए हैं. इसी कारण कांग्रेस ने बिल के पक्ष में हाँ तो कह दिया मगर अब उसको नित नए बहाने बनाने पड़ रहे हैं. कांग्रेस ही क्या कोई भी दल होता तो वो यही करता.क्योंकि जितने भी लोग संसद तक पहुँच रहे हैं सब गले गले तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. आज संसद तक सामान्य नागरिक पहुँच ही नहीं सकता. इतना सब होने के बाद भी मै आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ की इनको जन लोकपाल बिल पास कर ही देना चाहिए वरना ये नहीं तो कोई और मगर अब जनता का जो दबाव अन्ना जी ने बनाया है उसके आगे इनको झुकना ही पडेगा. धन्यवाद.

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प्रमोदभाई कोंग्रेस ने अभी अभी हार नही मानी है । मानों RSS उन्डर वर्ल्ड का डोन हो ऐसे अन्ना के साथ के सबूत पेश किये जाते है । सबूत कोर्ट मे नही जनता के आगे पेश करते हैं । कोर्ट में पेश करते तो फटकार खानी पडती, ये किस गुनाह के सबूत है । जनता के आगे रोने का एक ही मकसद है अन्ना के सपोर्टरों को तोड दो । मुस्लिमों को तो मुर्ख ही समजते आ रहे हैं, जहा RSS हो वहा आप क्यों । एक दुसरा दाव भी उस के हाथमें आगया है । कश्मीर पर भुषण की निजी( हर समय आदमी संथा का नही होता अपनी खूद की भी जिन्दगी होती है ) राय पर अन्ना के सपोर्टरों को मारा जा रहा है । नाम दूसरों का है लेकिन काम कोन्ग्रेस का ही लगता है । कोर्ट्में कुछ दिन पेहले बोम्ब फटे हैं, पोलिस का बन्दोबस्त भी है लेकिन उसी जगह पर अन्ना टोपीवालों को गुन्डे मारते रहे और पोलिस देखती रहे ये कैसे हो सकता है । मोदिने तो ऐसा नही किया था लेकिन दिल्ली के कोर्ट के परिसरमें ये हो गया ।

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प्रमोद जी नमस्कार, मै आज तक नहीं समझ पाया की कैसे कोई किसी शहर को अपनी बपौती बना सकता है क्या उस शहर के विकास में उसका कोई अमूल्य योग दान है? क्या किसी प्रदेश का पिछड़ा होना वहां जन्म लेने वाले के कारण है? और यदि आप बड़े रौब से किसी सम्प्रदाय की बात रख रहे हो तो पुरे प्रदेश की बात करो. यदि केंद्र में बठी सरकार सभी प्रदेशों के हित में सोचे तो कोई क्यों दुसरे प्रदेश में जाएगा. मगर ये तो ऐसी ना......... सरकार है जो पडोसी मुल्क में बैठे आतंकियों का तो पूरा ब्यौरा जारी करती रहती है उसके प्रत्यर्पण की बात करती है किन्तु हमारे देश में ही छुट्टे घूम रहे आतंकियों को राज नेता का दर्जा दे कर आँखे बंद कर लेती है.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय श्री अशोक जी सादर प्रणाम बांछड़ा समाज पर आपसे मिली जानकारी हेतु कोटिश धन्यवाद। संबंधित विषय पर विचार के मंथन का मध्यावकाश हो सकता है पर इति नहीं।  वास्तव में इसे प्रारंभ कह सकते हैं। ईश्वर की विशेष कृपा है कि चाहे कोई गांव हो या शहर। यहां तक कि हर गली में सही और गलत लोग मिल जाएंगे। संयुक्त परिवार में ही सही  और गलत लोग मिल जाते हैं। हमारे आपके प्रयास से अनुचित कार्यों में कमी आ सकती है  और उचित कार्यों में इजाफा हो सकता है। शत-प्रतिशत न तो बुराई खत्म होगी और न ही शत-प्रतिशत अच्छाई आयेगी।हमें सामाजिक मामलों में धर्य रखकर यथासंभव एकल या  संयुक्त रूप से प्रयास कर खुद के दायित्वों का निर्वहन करते रहने की जरूरत है। ऐसी समस्याओं  से लड़ने के लिए हमें नेवला के लट नामक जड़ी सूंघकर विषैले सर्प पर विजय प्राप्त करने से प्रेरणा लेने की जरूरत है। नये संकल्प के साथ पुनः कोटिश नमन।      

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आदरणीय प्रमोद जी नमस्कार, भाईसाहब अब मुझे तो इस बात का सिरा भी नहीं दिख रहा और अंत तो शायद है है नहीं.इसलिए मै चाहूंगा की इस अंतिम प्र्तुत्तर के पश्चात भी आपके मन में कई बातें जानने की रह ही जायेंगी. मै और आप जब कभी मिलेंगे तो फिर हम उस पर और भी चर्चा कर सकेंगे. बांछड़ा समाज के बारे में भी मै संक्षिप्त किन्तु अंतिम जानकारी विशेष आपकी जानकारी के लिए ही लिख रहा हूँ. इस समाज में पुरुष कोई कार्य नहीं करता हाँ मजबूरी के कारण चोरी डकैती जैसे अपराधों में इनका लिप्त होना पाया गया है. इनके यहाँ प्रथा है की ये अपनी ही पुत्री या यों कहें की घर की सभी महिला सदस्यों को इस गलत कार्य में सम्मिलित रखते हैं. इनके समाज का विस्तार राजस्थान से लगे हुए मध्य प्रदेश की तरफ है. इनके यहाँ पुत्री होने पर खुशियाँ मनाई जाती हैं.शायद पुत्र की ह्त्या भी कर दी जाती हो. इनके कोई अलग से वैश्यालय नहीं है ये लोग परिवार के साथ ही रहते हैं.वहीँ पर इनका अनैतिक कार्य भी चलता रहता है.सड़क किनारे बसे होने से सर्वाधिक इनके यहाँ जाने वालों में ट्रक ड्राईवर अधिक होते हैं. प्रदेश शासन द्वारा इनकी सुध ले कर इनका पुनर्स्थापन का प्रयास भी किया गया किन्तु उसके नतीजे कोई बहुत प्रभावशाली नहीं हैं. हाँ कुछ परिवार अवश्य ही वहां से अलग हो गए किन्तु शासन ने इनकी कोई इतनी बड़ी मदद नहीं की जो की ये लोग पुरे मन से इस काम को छोड़ देते. ऐसा कोई उदाहरण देखने में नहीं आया की इनके यहाँ से छुड़ाई गयी कन्या किसी ऐसे माँ बाप की संतान हो जो की कन्या नहीं चाहते अधिकांश गरीबी ही होना प्रकाश में आया है.हाँ ये जरूर हो सकता है की आस्पताल से चोरी हुए बच्चे इनके यहाँ तक भी पहुंचे हों, मगर इसका कोई प्रमाण अभी तक नहीं है. आपका फिर आभार आपने रूचि ली आगे हम जब भी मिलेंगे या फिर कोई अवसर होगा तो मेरे पास उपलब्ध जानकारी से आपको अवश्य ही अवगत कराउंगा. धन्यवाद. इति.

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आदरणीया निशा मित्तल जी,आदरणीय श्री अशोक जी आप दोनो को नमन। मुझ ना समझ की बात निशा जी को स्पष्ट नहीं हो सकी। इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं। संबंधित विषय को हम जितनी बार बोलेंगे, मुझे लगता है। खुद को अपराध बोध होता है, क्योंकि समाज में खामियों के लिए हम कम जिम्मेदार नहीं हैं.... “बांछड़ा समुदाय” को संचालित करने वाले तथाकथित प्रमुख और ऐसे धन्धें को चलाने वाले लोगों से आपको खतरा हो सकता है। आप पर मुझे किसी प्रकार का कोई शक नहीं है। न तो मैंने अपनी बात में कहीं आप पर शक जाहिर किया है। (महज हंसने के लिए)आपने शक की बात कर शक पैदा कर दिया है। भगवान भूतभावन से आशीर्वाद चाहता हूं कि अधर्म की लड़ाई में पूरा साथ निभा सकूं। मुझे उम्मीद थी कि धर्म के नाम पर कोई अधर्म जैसी कोई बात है, जिसके चलते कुरीति चली आ रही है। अब इस कुरीति में गरीबी मददगार साबित हो रही है। आंख पर पट्टी बांधकर समस्या के निदान की कोशिश में जुटे हमारे जैसे इंसान को एक रास्ता मिला। एक निवेदन है कि आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि कहीं कथित सभ्य समाज जो भ्रूण (कन्याओं) हत्या का विरोधी है ऐसी गन्दी कुरीति के पीछे परदे के रूप में खड़ा तो नहीं है। कन्याएं देवियां है। इनके बिना सृष्टि या उसका विस्तार संभव नहीं है। जिन लोगों ने कन्याओं की उपेक्षा की है उनके परिवार का मुखिया पुरूष नहीं होना चाहिए। इसके अपवाद भी हैं। जो इन्हें बेचकर पैसे कमाने की सोच रखता है, वहीं असूर है, राक्षस है....जहां से समस्या प्रारंभ हो रही है, उसे रोकने के लिए सतत प्रयास की जरूरत है। माननीय न्यायापिलका तो हमारी व्यस्थापिका द्वारा बनाये कानूनों को कार्यपालिका द्वारा पालन नहीं होने पर दण्ड दे सकती है। पहले राष्ट्रीय स्तर पर “बांछड़ा समुदाय” की रीतियों और कुरीतियों का व्यापक अध्ययन किये जाने की जरूरत है और मुझे लगता है कि “बांछड़ा समुदाय” पर जरूर शोध कार्य हुए होंगे। उनमें इन बातों का उल्लेख होना चाहिए। मेरे जैसा नासमझ इंसान पूरे देशवासियों से अपेक्षा करता है कि वासना को ढाल बनाकर चल रहे ऐसे कार्यो पर स्थाई तौर पर रोक लगाने की श्री अशोक जी के बातों पर गंभीरता से विचार किया जाय और इसे अनिवार्य दायित्व माना जाय। मेरा संकल्प है कि मुझसे जो कुछ बन पड़ेगा, इसके लिए करूंगा। ऐसी कुरीतियों को सामने लाने के लिए श्री अशोक जी को कोटिश धन्यवाद। संबंधित मामले पर अब भी मेरे मन में विचार मंथन है।

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प्रमोदजी नमस्कार.   बहूत ही अच्छा  समाज को दर्पण दिखाता आलेख. क्षमा करें पर जब कोई यह लिखता है कि क्या कानून की जरुरत तो मुझे लगता है वह जैसे कह रहा हो युं ही चलने दो ना आपको क्या परेशानी है. आपने लिखा है वेश्यालय में एक बार पिता पुत्री की मुलाकात हो गयी. यदि समाज का चरित्रपतन  होता रहा तो इन घटनाओं की पुनरावृत्ति अवश्य होगी. मुझे आपके आपके आलेख में इस बात की कमी खली कि आपने उन लाखों महिलाओं को समाज में किस तरह वापस लायें इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया. आज तक मेरी नजर में सिर्फ दिल्ली का एक ही व्यक्ति है जिसने इस पर कार्य किया है. मैने अपने ब्लाग पर भी शायद लिखा हो .मैं जिस कानून की बात कर रहा हूं वह इस घृणित पेशे मे आने या धकेले जाने दोनो स्थिति में महिलाओं को बचाता है साथ ही उन महिलाओं की सुरक्षा करता है जो किसी भी प्रकार इस गैर सामाजिक पेशे से जुडी हैं.  और अंत में मैं  आपको एक और विषय देता हूं आप वर्तमान समाज को बिना वेश्यालय के कल्पना करके देखें

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अटलजी की चुप्पी वाकई रहस्यमय है। और अटलजी ही क्यों, माननीय अब्दुल कलाम आजाद जी, अडवानी जी अथवा अन्य राष्ट्रभक्त नेताओं में भी एक रहस्यमय चुप्पी है। लगता है एक सशक्त लोकपाल बिल लाने के मुद्दे पर सभी जुबानी लड़ाई ही लड़ना चाहते हैं। वास्तविक धरातल पर कोई भी इसे क्रियान्वित होने देना नहीं चाहता। अब तो कुछ ही दिनों की बात है। लोकसभा सत्र में ही इस बात का निपटारा हो जायेगा कि कऔन सच्चा है और कौन झूठा। अन्ना द्वारा प्रस्तावित लोकपाल बिल में ऐसा क्या है जिससा सरकार और विपक्ष इतना घबराये हुए हैं। वह एक साफ, स्वच्छ और सशक्त बिल है, जो त्वरित् कार्रवाई करेगा। जिसकी सख्त आवश्यकता है और जो सम्पूर्ण जनमानस की मांग है। आखिर ये कबतक समय बितायेंगे। 64 साल तो बीत गये। लेकिन प्रमोदजी, सबसे आपत्तिजनक भूमिका मिडिया की है। ये मांस देख कर मँडराने वाले गिद्धों के झुण्ड हो गये हैं। इन्हें जनमानस की चेतना से कोई मतलब नहीं है। इन्हें मसाला चाहिये। ये सत्य के प्रहरी नहीं रह गये हैं बल्कि चटखारेदार मसालाखोर बन गये हैं। आज प्राय सभी चैनल भ्रामक भविष्यवाणियाँ, राशिफल, यन्त्र और अँगूठी बेचने में लगे हैं। जो समय इस देश की मानसिकता को सँवारने में लगाना चाहिये, उसे ये प्रवचन सुनाकर बरबाद कर रहे हैं। यह इनके पतन की सीमा ही है। नेताओं की तरह ये भी जनता को मूर्ख ही समझते हैं। पर ये भूल कर रहे हैं। समय इनको भी जवाब देगा।

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